पानी की एक-एक बूँद का मान: पुराने कुंडों और टांकों की अनूठी मरुस्थलीय जल परंपरा
आधुनिक पाइपलाइनों से सदियों पहले थार के लोगों ने छत और आगोर के हर कतरे को सहेजने का जो विज्ञान गढ़ा, वह आज भी प्रेरणा है।

बुजुर्ग कहते हैं—'घी ढुल्या म्हारो कुछ नी जावे, पाणी ढुल्या म्हारो जीव जावे।' थार में पानी का सम्मान ईश्वर के समान रहा है।
गाँव के हर घर और खेत में पक्के टांके (पारंपरिक जल कुंड) बनाए जाते थे, जिनका आगोर इतना साफ रखा जाता था कि बारिश का पानी सीधे कुंड में छनकर गिरता था। यह पानी 2 साल तक बिना खराब हुए मीठा और शीतल रहता था।
आज जब भूजल स्तर गिर रहा है, 507 हेड के कई किसान अपने खेतों में फार्म पौंड और रेन वाटर हार्वेस्टिंग टांके बनाकर न केवल पीने का पानी सहेज रहे हैं, बल्कि नहरी बंदी के समय फसलों को भी जीवनदान दे रहे हैं।
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लेखक / संपादकीय टीम
507 Head संपादकीय टीम
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